राघव ने जाते-जाते दुनिया को दी नई दृष्टि, इकलौते पुत्र के निधन पर मित्तल परिवार ने पेश की मानवता की मिसाल

Raghav left a new vision for the world, and the Mittal family exemplified humanity after the death of their only son.

सहारनपुर/गंगोह। अंधेरी गलियों को, हम रोशन करके चले जाएंगे… मरने के बाद नेत्रदान करके, हम नैनों के दीपक बन जाएंगे। इन पंक्तियों को अक्षरशः चरितार्थ करते हुए सहारनपुर निवासी संजय मित्तल ने अपने इकलौते पुत्र राघव के असामयिक निधन के बाद उसकी दोनों आँखें दान कर मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश की है। राघव की इन आँखों से अब दो दृष्टिहीन व्यक्तियों के जीवन का अंधकार मिट सकेगा और वे पुनः इस सुंदर दुनिया को देख पाएंगे।
दिवंगत राघव का जीवन मात्र 2 वर्ष की आयु से ही शारीरिक और मानसिक चुनौतियों से भरा रहा। वह मानसिक अपंगता एवं अर्द्ध-विकसितता से जूझ रहा था। पिता संजय मित्तल और माता स्वाति मित्तल ने देश के बड़े से बड़े अस्पतालों में राघव का उपचार कराया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मात्र 21 वर्ष की अल्पायु में राघव इस नश्वर संसार को त्याग कर चला गया, परंतु जाते-जाते दो नेत्रहीनों के जीवन को प्रकाशित करने का पुण्य कार्य कर गया।
दृष्टि-एक प्रयासश् संस्था के अध्यक्ष डॉ. अमित गर्ग के साले संजय मित्तल और अनिल मित्तल ने राघव के निधन के तुरंत बाद नेत्रदान की इच्छा जताई। सूचना मिलते ही रोशनी आई बैंक चिकित्सालय सोसाइटी, सहारनपुर की टीम सक्रिय हुई।

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